परम - परमपूज्य श्री श्री बाबाश्री जी ने अपनी ओजपूर्ण वाणी से कहा-
‘परिक्रमा क्या देगी ? पूर्णतः, परिपूर्णता और सम्पूर्णता...
यही है परिक्रमा का अर्थ और यही सामर्थ्य है पैदल यात्राओं की।

यह माँ नर्मदा की 'परिक्रमा का सार' है। यह बुद्धि-कौशल के प्रभाव से प्राप्य नहीं है। यह तो ज्ञान के सत्यांश से प्राप्त अनुभूति का ऐसा दिव्य प्रकाश है, जिससे अन्तर आत्मा जागृत हो उठी है। जीवन को सही मार्गदर्शन मिला है।

यह मेरे आराध्य श्री श्री बाबाश्री जी के ज्योति पुंज की अनुकम्पा-कृपा और उनके द्वारा की गयी रक्षापूर्ण दया के सान्निध्य की स्मृतियाँ हैं। इन्हें मैंने अपने सहपरिक्रमावासियों के साथ साथ श्रवणेद्रियों से ग्रहण करके इन पृष्ठों में अंकित भर करने का प्रयत्न किया है।
उन्हीं श्रीचरणों की असीम अनुकम्पा से और आज्ञा मिलने पर इसे मुद्रित कराकर आप तक पहुँचाने की छोटी-सी चेष्टा है।

नर्मदे हर ! ॐ श्री माँ !!


परिक्रमा – केवल यात्रा नहीं, जीवन का सार है।

इस पुस्तक में माँ नर्मदा की परिक्रमा से मिली अनुभूतियाँ, शिक्षाएँ और आध्यात्मिक प्रकाश का सार संकलित है।

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